veda वेदों को न मानने वाले पहले जानो तो सही वेद है क्या ?

veda वेदों को न मानने वाले पहले जानो तो सही  वेद है क्या ?:


जिन्होंने कभी हमारे धर्म ग्रंथोंको  वेदों veda,ved को जानने की कोशिश नहीं की वही लोग सबसे ज्यादा कुतर्क करते हैं सनातन धर्म का आधार वेद vedaको समझेंगे जानेंगे  हमारे मन में इस प्रकार के तुच्च विचार कभी नहीं आएंगे


veda वेदों को न मानने वाले पहले जानो तो सही  वेद है क्या है?
type fo veda

what is 4veda वेद क्या है,


वेद क्या हैwhat is veda सामान्य रूप से वेद शब्द  विद धातु से बना हुआ है जिनका 4 अर्थ होता है ज्ञानसत्ता, लाभ और विचारण जिसके कारण मानव सभी सत्य विधाओं से ज्ञान प्राप्त करता है और वही मनुष्य भविष्य में जाकर विद्वान होता है उसी को वैदिक पंडित कहते हैं 

हिंदू धर्म के वेद ही मूल स्रोत  होने के कारण वेदों का महत्व सबसे ज्यादा हैहमारा  सनातन धर्म vedaवेदों में स्थित विचारधारा से ओतप्रोत है वेद सिर्फ आर्यों के ही नहीं बल्कि समस्त मानव जाति के लिखित रूप में उपलब्ध एक प्राचीनतम ग्रंथ  है

 विश्व के अनेक विद्वानों ने इस बात पर आश्चर्य व्यक्त किया है शताब्दियों तक भारतीयों ने वेदों को अपने मस्तिष्क में याद रख कर उन्हें जीवित किया वेद को श्रुति भी कहते हैं क्योंकि वेदों को श्रुति कहने के पीछे प्राचीनकाल में गुरु और शिष्य परंपरा के माध्यम से वेदों का अध्ययन होता था और शिष्य गुरु द्वारा सुनाए गए मंत्रों को सुनकर याद रखते थे इसीलिए वेद  को श्रुति भी कहते हैं

 गुरु ने अपने शिष्यों केसामने वेदों का उच्चारण किया और शिष्यों ने अपने कानों से अर्थात श्रुति से उसे सुना उसका शिष्यों नेआवृत्ति किया और उस गुरुद्वारा सुने हुए मंत्र  को याद किया कालांतर में जब वही वेद पाठी शिष्य बड़े होकर गुरु बनते थे तो वह भी अपने नए शिष्यों को ठीक इसी प्रकार से वेदों का पठन-पाठन कराया  करते थे जिसका फल स्वरुप यह श्रुति अर्थात वेद veda  इसी माध्यम से सदा के लिए शुद्ध बने रहे
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type fo veda वेदों के प्रकार

ऋग्वेद rigveda

type fo veda वेदों के प्रकार
veda

वेद चार प्रकार के होते हैं ऋग्वेद सामवेद यजुर्वेद और अथर्ववेद सबसे पहले बात करते हैं ऋग्वेद की ऋग्वेद rig vedaआर्यों की सबसे  प्राचीन पुस्तक है  जिसमें सभी प्रकार के देवी देवताओं की स्तुति की गई है यह भी दो भागों में विभक्त है प्रथम भाग अष्टक क्रम  है जो 8 अष्टको में विभक्त है हर एक अष्टक में 8 अध्याय हैं अध्याय में भी वर्ग है और वर्ग रिचाओं के समुदाय को कहते हैं

 ऋग्वेद में लगभग 5 मंत्रों का एक वर्ग होता है ऋग्वेद में कुल 2006 वर्ग हैंऋग्वेद का द्वितीय भाग मंडल क्रम है जिसमें 10 मंडल हैं इसमें भी कई अनुवाक है जो मंत्र अथवा ऋचा युक्त सूक्त पर आधारित है इस प्रकार से कुल 85 अनुक्रमांक हैं तथा 1017 सूक्त है इनमें 11सूक्त शामिल नहीं है नहीं किया गया है जो बालखि कहलाते हैं
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 सबसे मजे की बात ऋग्वेद के द्वितीय से सप्तम मंडल तक अंश वंश मंडल कहलाता है जिनके ऋषि क्रमश विश्वामित्र वादेवअत्रि भारद्वाज और वशिष्ठ है ऋग्वेद का पूरा नवम मंडल सोम मंडल सोम देवता के विषय में चर्चित होने के कारण यह मंडल पवमान मंडल कहलाता हैअनेक विद्वानों ने इसके प्रथम और दशम मंडल जिनमें 191 191 सुक्त हैं इसको आधुनिक माना है

 ऋग्वेद में अनेक देवी देवताओं को अलग अलग ऋषि-मुनियों  ने अत्यंत सुंदर शब्दों में स्तुतिकी  है इन शब्दों का प्रयोग यज्ञ के अवसर में किया जाता था जिसके कारण कुछ संवाद सूक्त भी मिलतेहैं जैसे यम यमी संवाद  उर्वशी संवाद सरमा पणी संवाद आदि जिन में अनेक विद्वानों नेसंवाद के रूप में अपने विचार व्यक्त किए हैं इन संवाद सूत्रों की संख्या 20 है इनके अलावा ऋग्वेद में कई स्थानों में दार्शनिक सूक्त भी  मिलते हैं जिनसे हमारे ऋषियों का मौलिक चिंतन हमारे सम्मुख उत्पन्न होता है।

यजुर्वेद yajurveda


यजुर्वेद के दो संप्रदाय हैं ब्रह्मा और आदित्य नाम से और आदित्य नाम से इन्हीं दोनों को क्रमशकृष्णा यजुर्वेद और शुक्ल यजुर्वेद कहा जाता है कृष्ण यजुर्वेद की प्रधान शाखा तेतरीय है जिसमें गद्यऔर पद्य दोनों का वर्णन मिलता है शुक्ल यजुर्वेद की वाजसनेही संहिता बहुत प्रसिद्ध है इसमें किसी प्रकार का गद्य नहीं है शुक्ल यजुर्वेद yajur vedaके मंत्र विभिन्न प्रकार के यज्ञों और कर्मकांड के लिए उपयोग किए जाते हैं जो अनेक फलों की प्राप्ति के लिए विभिन्न वर्गों के व्यक्तियों द्वारा किया जाता है 

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सामवेद samveda


सामवेद ऐसा माना जाता है सामवेद स्वरों का वेद है संगीत का वेद  है  इसके मंत्र विविध  स्वरों में गाए जाते हैं
 सामवेद के आर्चिक और गायन रूप में मुख्य दो प्रधान भाग हैं ऋषि पतंजलि ने सामवेद वेद ही जीवन का सार ऐसा बोलकर पुराणों का यह कथन सिद्ध कर दिया है यदि जीवन में आनंद चाहिए रस चाहिए खुशी चाहिए तो वह सब हमें सामवेद से ही मिल सकता है सामवेद की महिमा अपरंपार है सामवेद की लगभग 1000  शाखाएं हैं गायन प्रधान सामवेद संगीत की सूक्ष्मता को ध्यान में रखते हुए यह संख्या कल्पित नहीं लगती ऋषियों ने सामवेद पद्धति को  चार प्रकार की मानी हैगेय ,आरण्यक,ऊह ,उह्य हमारे भारतीय संगीत शास्त्र का मूल इन्हीं शाम गायन ओन पर आधारित है इनके प्रस्ताव, उद्गीथ, प्रतिहार ,उपद्रव व निधन रूप से 5भाग होते हैं

अथर्ववेद atharwaveda


अथर्ववेद को इस संसार में सबसे ज्यादा फल देने वाला वेद माना गया है यज्ञ के संस्कार के लिएअथर्ववेद को ही आवश्यक माना जाता है पुरोहित राजा के शांति और यज्ञ कार्यों का संपादन अथर्ववेद द्वारा ही  करते हैं
इस वेद को ब्रह्मा वेद भी कहते हैं अथर्व शब्द का अर्थ अहिंसा वृत्ति से मन की स्थिरता प्राप्त करने वाला होता है पहले के विद्वानों के अनुसार सुख उत्पन्न करने वाले अच्छे जादू टोना के लिए अथर्ववेद के मंत्रों का प्रयोग अधिक मात्रा में होता हैइस प्रकार सामान्य जन के लिए अथर्ववेद atharwa veda बहुत ही महत्वपूर्ण स्थान रखता है

यदि vedaवेदों के विषय में यदि और ज्यादा जानकारी चाहिए तो कृपया यह वीडियो जरूर देखें

veda वेदों को न मानने वाले पहले जानो तो सही वेद है क्या ? veda वेदों को न मानने वाले पहले जानो तो सही  वेद  है क्या ? Reviewed by Ourbhakti on April 10, 2019 Rating: 5

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