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पितृ पक्ष में पितरों को खुश करे एसे ले पितरों से आशीर्वाद

 पितृ पक्ष की कथा | श्राद्ध विधि और नियम 

क्या है पितृ पक्ष ? पितृ पक्ष में श्राद्ध कैसे करें ? पितृ पक्ष का रहस्य  क्यों इसका इतना महत्व है पित्र पक्ष में किन बातों का ध्यान रखना चाहिए ? पितृपक्ष का  पूर्वजों से  किस प्रकार का संबंध है?चलिये आज इन्ही सब बातों को जानने का प्रयास करेंगे।


पितृ पक्ष में पितरों को खुश करे एसे ले पितरों से आशीर्वाद
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पितृ किसे कहते हैं | pitri kise kahate hain


जब हमारे कोई अपने इस दुनिया को छोड़कर चले जाते है तब वही  पितृ कहलाते हैं। पितृ पक्ष में मुख्यत 3 पीढ़ी को ही याद किया जाता है 1.पिताजी 2,दादाजी, और परदादा साथ ही इनकी पत्निया इन्ही को ही श्राद्ध पितृ पक्ष में तर्पण और पिंडदान दिया जाता हैं ।

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पितृ पक्ष श्राद्ध कैसे किया जाता हैं | pitra paksh sharadh kaise kare


भाद्र शुक्ल प्रतिपदा से शुरू होने वाले पर्व को पितृ पक्ष कहते हैं इसमे अपने पितरों के साथ अपने नाना का भी पिंड दान होता है।पहले अपने माता पिता का तर्पण उसके बाद अपने नाना के 3 पीडी का तर्पण किया जाता हैं।तर्पण का कार्य सम्पन्न होने के बाद फिर अपने पिता,दादाजी,परदादा का साथ ही माता,दादी,परदादी का पिण्ड पहले दिया जाता है उसके बाद अपने नाना के तीन पीडी का पिंड दान किया जाता है।
पितृ पक्ष इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्यों कि इसमें अपने पितरों के साथ-साथ अपने नानाओ का श्राद्ध किया जाता हैं।

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कब दिया जाता है पितरों को पिंडदान | kab diya jata hai pitri ko pinddan


अपने मरे हुये पित्रो को कब देना चाहिये पिंड दान इसको इस सामान्य उदाहरण से समझा जा सकता हैं जिस प्रकार से हम अपना बर्थडे मनाते हैं ठीक उसी प्रकार से हम अपने पित्रो का डेथ डे मनाते है।बर्थडे को जन्म दिन मनाना कहते हैं जो अंग्रेजी महीने के हिसाब से मनाया जाता हैं। डेथ डे को श्राद्ध करना कहते हैं  जो हिन्दू कैलेंडर को ध्यान में रखकर तिथि के अनुसार किया जाता हैं बस इतनी सी बात हैं।

पितृ पक्ष की कथा
हमारे हिंदू धर्म में पितृ पक्ष को लेकर बहुत कथाएं  हैं उनमें से सबसे ज्यादा कहीं जाने वाली कथा कर्ण  की कथा हैं
जब महाभारत का युद्ध समाप्त हुआ महारथी कर्ण वीरगति को प्राप्त हो गए  जब कर्ण स्वर्ग पहुंचे तब उन्हें भोजन में सोने चांदी हीरे आदि परोसा गया फिर कहा आप इसे ही खा लीजिए आपको भोजन में और कुछ नहीं मिलेगा।
देवताओं की बात सुनकर  कर्णआश्चर्य में पड़ गए उन्हें बड़ा हैरान हुआ और कहा कि ऐसा क्यों भला सोने-चांदी  कौन खा सकता है!

तब इंद्रआदि देवताओं ने कहा आपने पूरे जीवन में सिर्फ सोना ही दान किया है। कभी अपने पितरों का श्राद्ध तर्पण नहीं किया

किसी को अन्न का कण भी दान में नहीं दिया अतः आपको भोजन नहीं मिल सकता आप सिर्फ सोना ही खा लीजिए।

कर्ण ने देवताओं से कहा मुझे मेरे पूर्वजों के बारे में कुछ नहीं पता! न ही मुझे किसी ने बताया आप मुझे एक मौका दीजिए ताकि मैं अपनी गलती को सुधार सकूं।

कर्ण की बात सुनकर देवताओं ने फिर से महारथी कर्ण को पृथ्वी में वापस भेज दिया और कहा अपनी गलती सुधारलो  कुछ पुण्य करके आओ।

तब कर्ण पृथ्वी पर वापस आए और उन्होंने अपने पितरों के लिए पिंड दान किया,गरिवो को खाना खिलाया,जरुरतमंदों की सेवा की 

तब जाकर कर्ण को स्वर्ग में मानसम्मान मिला देवतावो द्वारा आदरपूर्वक भोजन कराया गया।

 कर्ण ने ये सब कार्य भाद्र शुक्ल प्रतिपदा से लेकर आश्विन कृष्ण अमावस्या तक किया था इसलिये  इस पर्व को पितृ पक्ष कहा जाता हैं ।


अगर किसी को अपने पूर्वजों की मृत्यु की तिथि याद नहीं तो वह पूरे पितृपक्ष में गरीबो की सेवा करें दान करें और  अमावस्या के दिन अपने पितरों का श्राद्ध करे इससे पितृ खुश हो जाते हैं

pitru paksha rules in hindi | पितृ पक्ष का नियम 


पितृ  पक्ष में जौ,तिल,कुश,और जल का अधिक महत्व है इन सामाग्री के विना श्राद्ध कर्म नही हो सकता।

 दिवंगत पितरों को किसी तलाव या जलासय में जाकर खड़े होकर जल में थोड़ा जौ, तिल मिलाकर अर्घ देना बहुत अच्छा मना गया हैं ।

विशेष रूप से इस काम को किसी तीर्थ में जाकर करना चाहिए नहीं तो अपने घर पर भी कर सकते हैं।

पितृ पक्ष में सूर्य उदय से पहले पीपल के वृक्ष में जल देने से सभी पितृ खुश हो जाते हैं। पितृ पक्ष में यह नियम बनालें की मुझे रोज सुबह नहाधोकर पीपल के वृक्ष में जल देना है।

पितृ पक्ष में ज्यादा से ज्यादा उड़द की दाल का दान करें इससे  आपके पूर्वज (पितृ) जल्दी खुश हो जाते हैं।

पितृ पक्ष में दान का भी ज्यादा महत्व है इसलिये गरीब, दुखी,निर्धन को खाना खिलाये।

पितृ पक्ष श्राद्ध का काम पुरा हो जाने के बाद ब्राम्हणों को भी भोजन करना चाहिए ब्राम्हण खुश हो गए तो आपके पितृ भी खुश हो जाएंगे।
पितृ पक्ष में कौवे को भी खाना खिलाना चाहिए
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पितृ पक्ष में कौवे को भी खाना खिलाना चाहिए कोशिस  करें  पूरे 15 दिनों तक कौवो को खाना खिलाने का।

संभव होतो रोज 1 ब्राम्हण को भोजन कराये उसके बाद ही खुद भोजन खाये।



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