Very Interesting Untold Stories of Mahabharata | महाभारत की अनसुनी बातें जो आपको नहीं पता

Very Interesting Untold Stories of Mahabharata|महाभारत की अनसुनी बातें जो आपको नहीं पता



महाभारत (Mahabharata) हमारे सनातन धर्म का बहुत प्यारा धरोहर है। महाभारत को ज्ञान का भंडार भी कहा जाता है महाभारत में हर समस्या का समाधान मौजूद है। श्रीमद भगवत गीता जैसी अद्भुत ग्रंथ महाभारत Mahabharata की ही देन है।

 इसके रचयिता महर्षि वेदव्यास है जिस विषय की चर्चा महाभारत में नहीं कही गई है वह किसी और ग्रंथ में मिल ही नहीं सकता इसमें लगभग  1,11,000 श्लोक मौजूद हैं यदि आपको महाभारत के विषय में और जानना है तो आप यहां से पढ़ सकते हैं आज के इस लेख में हम महाभारत से संबंधित कुछ विशेष बातों पर चर्चा करेंगे जिन के विषय में पहले आप शायद ही जानते होंगे।

महाभारत की रचना वेद व्यास जी ने किया था पर इसको भगवान गणेश ने लिखा था।गणेश भगवान ने महाभारत को लिखने से पहले एक शर्त रखी थी  कि वेदव्यास बिना रुके बिना अटके महाभारत के श्लोकों को बोलते रहेंगे। व्यास जी ने भी गणेश के सामने यह शर्त रखी कि मैं बिना सोचे समझे कुछ भी श्लोक बोलूं पर आप उसको समझकर जान कर ही लिखेंगे। भगवान गणेश ने भी वेदव्यास का यह शर्त स्वीकार किया और महर्षि वेदव्यास बीच-बीच में  ऐसे श्लोक  बोलते थे जिन को समझने में  भगवान गणेश को परेशानी होती थी और इसी बीच महर्षि व्यास दूसरे श्लोक की रचना कर लेते थे।

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महाभारत का वाचन सबसे पहले वेदव्यास जी के शिष्य  ने महाराज जनमेजय की सभा में  किया था।जनमेजय अभिमन्यु के पौत्र परीक्षित के पुत्र थे।

महाभारत की अनसुनी अनसुलझी  बातें Untold Stories of Mahabharata


 भीष्म पितामह के पिताजी का नाम शांतनु था शांतनु का पहला विवाह देवी गंगा से हुआ था। पूर्व जन्म में शांतनु राजा महाभेष थे महाभेष ने बड़े-बड़े यज्ञ करके देवताओं के स्वर्ग को जीत लिया 1 दिन बड़े देवता और महाभेष ब्रह्मा जी की सभा में उपस्थित हुये उसी सभा में देवी गंगा भी आ गई।

 गंगा को देखकर राजा महाभेष उन पर मोहित हो गए और तिरछी नजर से देवी गंगा को देखते रहे महाभेष की इस हरकत को देख कर ब्रह्मा जी ने  महाभेष को श्राप दे दिया।महाभेष ने ब्रह्मा जी से क्षमा मांगी इस पर ब्रह्मा जी ने कहा तुम जिस गंगा को देख रहे हो वह तुम्हारा अप्रिय करेगी जिस दिन तुम गंगा के ऊपर क्रोध करोगे उस दिन मेरे श्राप से तुम मुक्त हो जाओगे।

ब्रह्मा जी के श्राप के कारण  राजा महाभेष अगले जन्म में राजा प्रदीप के पुत्र शांतनु बने और देवी गंगा से शांतनु का विवाह संपन्न हुआ। विवाह से पूर्व  गंगा ने  शांतनु से यह प्रतिज्ञा करवाया था कि वह कभी कुछ भी प्रश्न नहीं करेंगे। शांतनु ने गंगा की यह बात को स्वीकार किया।

 गंगा और राजा शांतनु की आठ संताने हुई  देवी गंगा ने अपने सात पुत्रों को बिना किसी सोचे समझे गंगा में प्रवाहित कर दिया । शांतनु ने गंगा को इस विषय में कुछ नहीं कहा क्योंकि शांतनु गंगा से वचनबद्ध थे।

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जब गंगा ने अपनी आठवीं संतान को गंगा में प्रवाहित करना चाहा तो राजा शांतनु को क्रोध आया और गंगा से इसका कारण पूछा तुम क्यों अपने सारे पुत्रों को जन्म लेते ही गंगा में प्रवाहित कर देती हो? तब गंगा ने पिछले जन्म में हुई सारी घटना को महाराज शांतनु को  बताया उसके बाद देवी गंगा अपनी आठवीं संतान को लेकर कहीं और चली गई और शांतनु को छोड़ दिया।

सनातन धर्म में 33 कोटि देवता माने गए हैं जिनमें अष्ट वसु का भी नाम है ऐसा कहा जाता है की वही अष्ट वसु गंगा के पुत्र हैं ब्रह्मा जी ने अष्टवसुओं को मनुष्य बनने का श्राप दिया था। देवी गंगा ने जन्म लेते ही अपने पुत्रों को  एक-एक करके गंगा में प्रवाहित किया  जिसके कारण वह ब्रह्मा जी के श्राप से मुक्त हो गए।

जब पांडवों के पिता पांडू मरने ही वाले थे तब उन्होंने अपने पुत्रों से कहा की ज्ञान हासिल और चतुर बुद्धिमान बनने के लिए उनका मस्तिष्क खाले !पांडू की यह बात किसी ने नहीं मानी सिर्फ सहदेव ने उनका मस्तिष्क खा लिया और उन्हें दुनिया में होने वाली, जो हो चुकी और जो हो रही है इस बात का पता चल गया यानी सहदेव तीनों कालों के ज्ञाता बन गए।

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सहदेव जो अपने पिता का मस्तिष्क खाकर बुद्धिमान बने थे उनमें भविष्य को देखने की क्षमता थी इसीलिए दुर्योधन सहदेव के पास गया और  शुभ मुहूर्त के विषय में जानना चाहा ।सहदेव जानते थे कि दुर्योधन मेरा सबसे बड़ा शत्रु है लेकिन फिर भी सत्य की राह पर चलते हुए सहदेव में दुर्योधन को युद्ध शुरू करने का सही मुहूर्त बताया था ।

धृतराष्ट्र का एक बेटा था जिसका नाम था यूयुत्सु जो गांधारी का पुत्र नहीं था यूयुत्सु एक वैश्य महिला का पुत्र था क्योंकि धृतराष्ट्र का अनैतिक संबंध एक वैश्य महिला के साथ हुआ था ।

पांडव जब जवान और युवा थे तो उस समय उनकी ख्याति दूर दूर तक फैली हुई थी  पांडवों से  सभी प्यार से बातें करते थे यह बात दुर्योधन को बिल्कुल भी अच्छी नहीं लग रही थी इसीलिए दुर्योधन ने पांडवों को  जलाकर मारने का फैसला किया । लेकिन विदुर ने भगवान श्रीकृष्ण को सांकेतिक भाषा का प्रयोग करके सारी बातें बता दी  और लाक्षागृह से बचने का भी तरीका बता दिया फिर पांडव लाक्षागृह से सुरक्षित निकल गए

हम आशा करते हैं आपको  महाभारत Mahabharata की  यह रोचक जानकारी बहुत अच्छी लगी होगी ऐसे ही ज्ञानवर्धक बातें जानने के लिए आप हमें फॉलो कर सकते हैं यदि आप लोगों का कोई सवाल या सुझाव हो या आप अपनी राय देना चाहते हैं तो हमसे संपर्क कर सकते हैं।धन्यबाद ...... 

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