24 मई 2023

Janeu Sanskar | यज्ञोपवीत जनेऊ संस्कार की सटीक जानकारी

 Janeu Sanskar | यज्ञोपवीत जनेऊ संस्कार की सटीक जानकारी 


ब्राह्मण बालक का 8वें या 11वें वर्ष, क्षत्रिय का 12वें वर्ष तथा वैश्य का 16वें वर्ष में यज्ञोपवीत संस्कार शुभ होता है, किसी अन्य के मत से ब्राह्मण 16वें, क्षत्रिय 22वें और वैश्य का 24वें वर्ष में यज्ञोपवीत होना शुभ है। ब्राह्मण का वसंत में, क्षत्रिय का ग्रीष्म ऋतु में तथा वैश्य का शरद् ऋतु में यज्ञोपवीत संस्कार शुभ है।

Janeu Sanskar | यज्ञोपवीत जनेऊ संस्कार की सटीक जानकारी


शुभ नक्षत्र हस्त, अश्विना, पुष्य, अभिजित, तीनों उत्तरा, रोहिणी, आश्लेषा, स्वाति, पुनर्वसु, श्रवण, धनिष्ठा, शतभिषा, मृगशीर्ष, मूल, रेवती, चित्रा, अनुराधा, तीनों पूर्वा और आर्दा ।


शुभवार – रवि, बुद्ध, गुरु, शुक्र एवं सोमवार, 


शुभ तिथियां - 2, 3,, 11, 12 शुक्ल पक्ष तथा 2, 3, 5 (कृष्ण पक्ष), परंतु आषाढ़ 10, ज्येष्ठ शुक्ल 2, पौष शुक्ल 11, माघ शुक्ल 12 तथा संक्रांति के दिन छोड़कर मध्याहन काल के पहले ही यज्ञोपवीत संस्कार करना शुभ होता है। लग्न शुद्धकर चंद्र शुद्ध करना शुभकारक है। 


ब्राह्मण का यज्ञोपवीत धारण पुनर्वसु नक्षत्र में न करें। यज्ञोपवीत संस्कार में पूर्व में लिखित सामग्री के साथ आठ पात्र, दण्ड, खड़ाऊं, झोली, जनेऊ, मूंज की रस्सी, पुष्पमाला होनी चाहिए।


यज्ञोपवीत संस्कार क्या है | What is Janeu Sanskar in hindi


हिन्दू धर्म एक प्रवाहशील जीवन धर्म है और जन्म ही नहीं जन्म के पूर्व से जीवन को संस्कारित करने की आवश्यकता पर बल देता है। गर्भाधान संस्कार से लेकर अत्येष्टि संस्कार तक सोलह संस्कार में गुंथी इसी जीवन पद्धति का सीधा-सा अर्थ है कि मनुष्य अपने परम लक्ष्य की यात्रा पूर्ण कर सके। 


गर्भाधान, पुंसवन अर्थात जीवन के इस धरा पर आगमन से पूर्व ही उसके स्वागत की तैयारी और अन्त्येष्टि जीव की सम्मानपूर्वक विदाई इस सम्पूर्ण जीवन यात्रा में न तो कहीं विषाद है, न अटकाव, न कोई द्वन्द्व । नित उत्सव के माध्यम से जीवन को एक महोत्सव में बदलने की घटना ही वास्तविक हिन्दू धर्म है। 


उपनयन संस्कार को और सरलता से समझने के लिए हमें इस शब्द को समझना होगा। उपनयन का अर्थ है' समीप ले जाना और बालक के माता पिता अपने बालक को उचित समय पर अपने कुल गुरु के समीप ले जाकर एक प्रकार से घोषित करते थे कि हम जो इसकी उत्पत्ति के माध्यम बने, वह आज से आपको समर्पित है।


अब आप इसके सुप्त प्राणों को अपनी तेजस्विता से झंकृत कर इसे वास्तविक जन्म दें। इसे ज्ञान की चेतना दें कि यह केवल इस देह की यात्रा को ही अपनी जीवन यात्रा न समझे वरन इसे सही अर्थों में ज्ञान प्राप्त हो सके और इसमें अपने कुल व गोत्र की अविछिन्न परम्परा से जुड़ने का बोध उत्पन्न हो सके। इस अवसर पर जिन मंत्रों का उच्चारण कर इस संस्कार को पूर्णता दी जाती थी, उनका बोध ही इतना पवित्र है, जो इस संस्कार के भीतर छिपी उच्चता को स्पष्ट करता है।

यज्ञोपवीत जनेऊ का महत्व | janeu yagyapawit ka mahatwa

खेद का विषय है कि वर्तमान में जिस प्रकार से अन्य संस्कारों की मूल भावना लुप्त होती गई और वे केवल कर्मकाण्ड बनकर रह गए. उसी प्रकार यज्ञोपवीत संस्कार भी अपनी मूल भावना खोता हुआ केवल एक कर्मकाण्ड बनकर रह गया है और 'जनेऊ' के नाम से लीक पीटने वाली कुछ रीतियों का बस पालन कर देने वाली बात रह गई, जबकि यज्ञोपवीत संस्कार तो किसी बालक के जीवन में वह मोड़ है, जब वह जीवन को समझने का अवसर प्राप्त कर पाता है।


यज्ञोपवीत संस्कार का अर्थ केवल इतना नहीं है कि बालक इसके पश्चात ब्रह्मचर्य व्रत धारण कर विद्या अध्ययन करता था, वरन इसका अर्थ और इसकी भावना इससे भी कहीं अधिक इस बात में छिपी रही है कि तभी उसका अपने जीवन में अपने गुरु से प्रथम परिचय बनता था, जिसे केवल परिचय मात्र कहना अपर्याप्त होगा क्योंकि इस अवसर पर इस संस्कार के द्वारा गुरु उस बालक के प्रति अपना प्रेम भाव स्पष्ट करते थे तथा उसे नवीन ढंग से संस्कारित करने का संकल्प लेकर स्वयं उसके जीवन में पदार्पण करते थे।



जिस संस्कार को परिष्कृत रूप में दीक्षा कहा जाता है, वही उपनयन संस्कार है। अंतर यह है कि जहां दीक्षा के माध्यम से किसी भी आयु वर्ग के व्यक्ति को संस्कारित करने का प्रयास किया जाता है, वहीं उपनयन संस्कार के माध्यम से बालक को उस समय संस्कारित किया जाता है, जब वह निर्मल होता है तथा जीवन के विकारों से सर्वथा मुक्त होता है। तब वह कोई भी संस्कार ग्रहण कर सकता है। अगर उसे इसी आयु में अच्छे संस्कार मिल जाएं, तब वह आगे चलकर जीवन के किसी भी क्षेत्र में उन्नति के शिखर तक जा सकता है। प्राचीन काल में प्रत्येक बालक को गुरु आश्रम में भेजा जाता था और उसे वेदारम्भ संस्कार प्रदान किया जाता था।



वेदारम्भ का अर्थ है विद्या का प्रारम्भ,साथ ही उसकी मेधा शक्ति का पूर्ण रूप से विकास हो सके। वर्तमान काल में शिक्षा का क्रम पांच वर्ष की आयु में ही हो जाता है और यह क्रम लगभग 25 वर्ष की आयु तक चलता ही रहता है। इस शिक्षा काल के मध्य अगर बालक को दीक्षा प्रदान की जाती है तो उसकी मेधा शक्ति कई गुना बढ़ जाती है। सामान्य भाषा में कहा जाए तो जितनी सुदृढ़ नींव होगी, भवन उतना ही स्थायी बन सकता है। अगर हम बालकों में ही श्रेष्ठ संस्कार और दीक्षा संस्कार प्रदान करते हैं तो उनके जीवन का भवन विशाल अवश्य बनेगा। आज प्रत्येक माता-पिता का यह कर्त्तव्य भी है कि वे अपने बालकों के प्रति विकास के लिए कार्य करें।


यज्ञोपवीत संस्कार के माध्यम से जहां बालक में ज्ञान का जागरण होता है, वहीं दीक्षा के माध्यम से इस जीवन से तथा पूर्व जन्मों के अनेक मैल, दोष, पाप समाप्त होकर निर्मलता आने की ऐसी क्रिया प्रारम्भ होती है जिसके फलस्वरूप बालक को फिर पग-पग पर बाधाओं का सामना नहीं करना पड़ता है।



मानव जीवन को पवित्र एवं उज्ज्वल बनाने वाले धार्मिक कार्यों को संस्कार माना है। संस्कार ही इस लोक व परलोक में पवित्रता लाने वाला होता है। हिन्दू जाति आज भी शास्त्रोक्त संस्कारों को करती आ रही है और करती रहेगी जिससे मानव जीवन, रूप, गुण, धन, संतान से युक्त रहे तथा धर्म, अर्थ, काम एवं मोक्ष की प्राप्ति करता रहे। संस्कार का उद्देश्य ही मानव जीवन के सर्वांगीण विकास के लिए है इसलिए संस्कारों का प्रत्येक मानव के लिए होना पहले भी आवश्यक था. आज भी आवश्यक है। अतः संस्कारों का उचित समय पर होना तथा शास्त्रोक्त विधि से होना परम आवश्यक है।



उपनयन संस्कार केवल बालकों का ही किया जाता है, परंतु कहीं-कहीं ये बालिकाओं का भी होता है। इसमें बालक थोड़ा-सा समर्थ होते ही यह प्रतिज्ञा करता है कि वह आकांक्षा व तृष्णाओं से दूर रहेगा। मानवता का जीवन-भर पालन करेगा। इसमें एक सच्चे सूत का बटा धागा जिसे जनेऊ कहते हैं, शरीर से चिपका रहता है जिसे वो सदैव धारण करता है। यज्ञोपवीत संस्कार से मानव में मानवता के बीजअंकुरित होते हैं। 



उच्च चरित्र का विकास होता है। जीवन-भर सीने पर चिपका ये धागा उसे कर्त्तव्यनिष्ठ जीवन जीने की प्रेरणा देता है। 'उपनयन' शब्द का अर्थ है 'उप+नी+लयुद्' अर्थात आचार्य के पास बालक को शिक्षार्थ ले जाना, भेंट की क्रिया, यज्ञोपवीत संस्कार, जनेऊ (उपवीत) आदि। शिशु को आचार्य द्वारा स्वीकृत कराने के लिए वेदाध्ययन हेतु विद्यार्थी बना देने की क्रिया 'उपनयन संस्कार' है। ब्राह्मण को सोलह वर्ष, क्षत्रिय को बाईस और वैश्य को चौबीस वर्ष की आयु तक उपनयन संस्कार करा लेना चाहिए क्योंकि तब तक सावित्री का अतिक्रमण नहीं होता है।



यथासमय उपनयन संस्कार सम्पन्न न होने से उस समय पश्चात ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य यज्ञोपवीत रहित होकर पूर्ण द्विजत्व प्राप्त नहीं कर पाते हैं और समाज में निंदित होकर 'व्रात्य' कहलाते हैं। मनुजी का इस सम्बंध 'कथन है—


अतऊर्ध्वत्रयोअप्येते सावित्रीपतिता व्रात्या

यथाकालमसंस्कृताः। भवन्त्यार्यविगर्हिताः ॥


व्यक्ति को समाज की पूर्ण सदस्यता की प्राप्ति में समर्थ बनाने की शिक्षा-व्यवस्था दीक्षा-विषयक आवश्यक है। उनमें सांस्कृतिक क्षमता के आधार पर ही कोई भी व्यक्ति समाज की सदस्यता प्राप्त कर सकता है और पूर्ण अधिकारों व विशेष सुविधाओं को प्राप्त कर सकता है। 

जनेऊ पहनना क्यू जरूरी है | janeu pahanna kyu jaruri hai 

जनेऊ पहनना क्यू जरूरी है | janeu pahanna kyu jaruri hai


उपनयन के बिना कोई भी द्विज नहीं कहला सकता था। जिस व्यक्ति का उपनयन न हुआ हो, वह समाज में विशेषाधिकारों से वंचित हो जाता था। उपनयन संस्कार समाज में प्रवेश का भी साधन है, क्योंकि इसके बिना कोई व्यक्ति विवाह नहीं कर सकता। उपनयन के विषय में सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण बात यह है कि इसके द्वारा दीक्षित व्यक्ति की गणना द्विजों में होती है। 


विद्यार्थी स्वयं आचार्य के समीप जाता और उसके छात्र होने की अपनी इच्छा व्यक्त करता था। मैं शिक्षार्थ आया हूँ, गुरुवर कृपया मुझे विद्यार्थी होने की आज्ञा प्रदान करें। इस पर आचार्य विद्यार्थी का नाम पूछता और उसे अपने छात्र के रूप में ग्रहण करता है। इसके पश्चात गुरु छात्र का हाथ पकड़कर उसकी रक्षा के लिए देवताओं से प्रार्थना करता है। वह उसके मार्गदर्शन के लिए पांच


आज्ञाएं भी देता है, तब छात्र को गायत्री मंत्र का उपदेश दिया जाता है और जब आचार्य ने किसी छात्र को अपने छात्र के रूप में स्वीकार कर लिया हो तो उसे मैथुन आदि नहीं करना चाहिए। उपनयन संस्कार का मुख्य उद्देश्य कामचार, कामवाद और काम का त्याग करके ब्राह्मबल, क्षात्रबल प्राप्ति के योग्य बनाना है।


अथर्ववेद में उपनयन शब्द का प्रयोग ब्रह्मचारी को ग्रहण करने के अर्थ में किया गया है। यहां इसका आशय आचार्य के द्वारा ब्रह्मचारी की विद्या में दीक्षा से है। ब्राह्मणकाल में भी उपनयन शब्द का प्रयोग इसी अर्थ में किया जाता है।


उपनयन संस्कार के उद्देश्य में भी अनेक परिवर्तन हुए। मूलत: शिक्षा ही इसका प्रमुख उद्देश्य था । उपनयन केवल पहले-पहल छात्र के गुरु के निकट जाने पर ही नहीं सम्पन्न होता था, अपितु वेद की किसी भी शाखा का अध्ययन प्रारम्भ करते समय बार-बार इसका अनुष्ठान करना पड़ता था। 


उपनिषदों में अनेक ऐसे स्थल हैं, जहां दर्शन की किसी नवीन शाखा अध्ययन के लिए गुरु के समीप जाने पर उपनयन किए जाने का वर्णन किया गया है। याज्ञवल्क्य के अनुसार — उपनयन का सर्वोच्च प्रयोजन वेदों का अध्ययन करना है। उपनयन पर-विद्या संस्कार है, किंतु जब इसे दैहिक संस्कार रूप प्राप्त हुआ तो संस्कार का कर्मकांड ही सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण बन बैठा। 


उपनयन संस्कार के विषय में विचारणीय समस्या थी। किस आयु में बालक का उपनयन किया जाए? सूत्रों में प्रतिपादित तथा आचार्यों द्वारा अनुमोदित साधारण नियम यह था कि ब्राह्मण का उपनयन आयु के आठवें वर्ष, क्षत्रिय का ग्यारहवें और वैश्य का बारहवें वर्ष करना चाहिए। क्योंकि ब्राह्मणों, क्षत्रियों और वैश्यों की गायत्री क्रमशः आठ, ग्यारह और बारह अक्षरों की होती है। अतः ब्राह्मणों ने उन्हीं के आधार पर तीन उच्चतर वर्णों के उपनयन की आयु क्रमशः आठ, ग्यारह और बारह वर्ष नियत की।


यज्ञोपवीत जनेऊ लगाने से व्यक्ति का दूसरा जन्म होता है || Janeu Sanskar

विद्वानों के अनुसार उपनयन एक अनिवार्य संस्कार है। अथर्ववेद में उपनयन व्यक्ति का द्वितीय जन्म माना जाता है और यह अधिक सम्भव है कि समाज के सभी द्विजों को अपना उपयुक्त स्थान उपनयन द्वारा ही प्राप्त होता था, किंतु द्वितीय जन्म की यह धारणा केवल उपनयन के सम्बंध में ही नहीं थी, यज्ञीय दीक्षा के साथ भी द्वितीय जन्म का सम्बंध स्थापित हो गया था। 


अतः वैदिक युग में द्वितीय जन्म का धार्मिक महत्त्व था तथा प्रथम तीन वर्षों के सभी सदस्यों का उपनयन करना अनिवार्य नहीं था। शास्त्रों द्वारा निर्धारित नियमों के आधार पर उपनयन एक ऐच्छित संस्कार था। अध्ययन के लिए इच्छुक कोई भी व्यक्ति गुरु के पास जाता और उपनयन कर लेता था, जबकि उसके अन्य सम्बंधी, जो इसके लिए उत्सुक नहीं होते थे।


एक अन्य विचारणीय प्रश्न था कि बालक को आचार्य के समीप कौन ले जाए? पितामह के मतानुसार पिता, पितामह, पितृव्य तथा ज्येष्ठ भ्राता ही बालक के संरक्षक थे। इसके अतिरिक्त परिवार के किसी ज्येष्ठ सदस्य को भी बालक को आचार्य के निकट ले जाने का अधिकार था। किंतु जब उसे ले जाने के लिए कोई भी न होता अथवा कोई भी उसे आचार्य के समीप ले जाने की चिंता न करता तो बालक स्वयं उपनयन के लिए आचार्य के समीप जाता था।


आचार्य का चुनाव कुछ निश्चित सिद्धांतों द्वारा होता था। यथासम्भव श्रेष्ठतम आचार्य प्राप्त करने का प्रयत्न किया जाता था, क्योंकि उपनयन का उद्देश्य ज्ञान की प्राप्ति था। अगर आचार्य स्वयं ही ज्ञान सम्पन्न तथा उच्च चरित्र का व्यक्ति न होता तो वह विद्यार्थी के जीवन का निर्माण नहीं कर सकता था। जिसको अविद्वान आचार्य उपनीत करता है, वह अंधकार से गहन अंधकार में पुनः प्रवेश करता है।


उपनयन संस्कार सम्पन्न करने के लिए कोई शुभ समय निश्चित कर लिया जाता है। प्रायः उपनयन उस समय होता था, जब सूर्य उत्तरायण में रहता है, किंतु वैश्य बालकों के लिए दक्षिणायन का समय भी उचित है। ब्राह्मण का उपनयन वसंत में, क्षत्रिय का ग्रीष्म में, वैश्य का शरद ऋतु में तथा अन्यों का उपनयन वर्षा ऋतु में होता था। ज्योतिष से सम्बंधित रचनाओं ने माघ से आषाढ़पर्यंत विभिन्न मासों के साथ भिन्न-भिन्न गुणों का योग कर दिया। 



जिस बालक का उपनयन माघ मास में किया जाता है, वह समृद्ध होता है। जिसका उपनयन फाल्गुन मास में होता है, वह बुद्धिमान होता है। चैत्र में उपनीत होने पर वेदों में निष्णात होता है, वैशाख में उपनयन करने में समस्त सुख-भोगों से सम्पन्न, ज्येष्ठ में उपनयन श्रेष्ठ होता है। संस्कार के लिए शुक्ल पक्ष को प्राथमिकता दी जाती है, क्योंकि वह हर कार्य के लिए आनंदमयी अवसर होता है। 


उपनयन संस्कार सम्पन्न होने के पूर्व एक मण्डप का निर्माण किया जाता था। संस्कार के एक दिन पूर्व अनेक शास्त्र सम्मत विधि-विधान किए जाते थे। गणेश की आराधना तथा श्रीमहालक्ष्मी, मेधा, पुष्टि, श्रद्धा और सरस्वती आदि अन्य देवियों का पूजन किया जाता था। उपनयन के पूर्व रात्रि को बालक के शरीर पर हल्दी के द्रव का लेप किया जाता और उसकी शिखा (चोटी) से एक चांद की अंगूठी बांध दी जाती थी। इसके पश्चात उसे सम्पूर्ण रात्रि पूर्ण मौन रहकर व्यतीत करनी होती थी। हल्दी का लेपन गर्भ के वातावरण का दृश्य उपस्थित करता है।


इसके पश्चात माता-पिता बालक को उस मण्डप में ले जाते थे जहां हवनकुण्ड होता है। धर्मशास्त्रों में ब्राह्मण भोजन, जो सदैव पुण्यकर माना जाता है तथा इस अवसर पर ब्रह्मचर्य का प्रतीक भी होता है। तब बालक का मुण्डन होता था। अगर उसका चूड़ाकरण हो चुकता है तो संकेतात्मक रूप से ही उसका मुण्डन करा दिया जाता था। मुण्डन के पश्चात बालक को स्नान कराया जाता था। यह क्रिया प्रत्येक संस्कार के लिए अनिवार्य थी। स्नान से व्यक्ति के तन और मन दोनों ही पवित्र हो जाते हैं।


स्नान पूर्ण होने पर बालक को अपने अंगों को ढकने के लिए वस्त्र दिया जाता है। अब से उसे विशेष रूप से सामाजिक शिष्टाचार का पालन और अपनी शालीनता तथा आत्मसम्मान का निर्वाह करना होता है, तब बालक आचार्य के निकट आता और ब्रह्मचारी होने की अपनी इच्छा व्यक्त करता था। मैं यहां ब्रह्मचर्य के लिए आया हूं। मैं ब्रह्मचारी बनूंगा। 


उसकी प्रार्थना स्वीकार कर आचार्य उसे मंत्र के साथ वस्त्र देता था जिस प्रकार बृहस्पति ने इंद्र को अमृतत्व का वस्त्रं दिया, उसी प्रकार मैं दीर्घायुष्य, दीर्घजीवन, शक्ति तथा तेज और ऐश्वर्य के लिए यह वस्त्र तुम्हें देता हूं। अतः उपनयन के अवसर पर भावी विद्यार्थी को वस्त्र दिया जाता है। इस अवसर पर दिया जाने वाला उत्तरीय मृगचर्म होता था गोपथ ब्राह्मण के अनुसार मृगचर्म आध्यात्मिक तथा बौद्धिक सर्वोच्चता का प्रतीक है।


इसके पश्चात मेखला पहना दी जाती थी। मेखला का निर्माण मूलतः वस्त्र की सहायता के लिए हुआ था। यह तिहरे सूत्र से बनाई जाती थी, जो इसका प्रतीक था कि ब्रह्मचारी सर्वदा तीन वेदों द्वारा सुरक्षित है। यज्ञोपवीत बालक को यह भी सूचित करता है कि वह श्रद्धा के तप से दुष्प्रभावों से वह उसकी रक्षा करेगी। ब्राह्मण की मेखला मूंज की, क्षत्रिय की प्रत्यंचा की तथा वैश्य की ऊन की होनी चाहिए। यह समान, चिकनी तथा देखने में सुंदर होनी चाहिए। यज्ञोपवीत धारण करने के पश्चात बालक को उपवीत सूत्र दिया जाता था, जो उपनयन संस्कार का सबसे महत्त्वपूर्ण अंग है।


किसको कैसा जनेऊ यज्ञपवीत पहनना चाहिये | kaun kaisa janeu pahane 

kaun kaisa janeu pahane


शास्त्रों के अनुसार ब्राह्मण को कपास का, क्षत्रिय को सन का तथा वैश्य को भेड़ के ऊन का उपवीत धारण करना चाहिए, किंतु समस्त वर्षों के लिए कपास का यज्ञोपवीत उत्तम प्रतीत होता है। इसका कारण कपास का सूत्र प्राप्त करने में सरलता थी। ब्राह्मण श्वेत उपवीत धारण करता था, क्षत्रिय लाल तथा वैश्य पीला। आधुनिक काल में वैश्व वर्ण द्वारा पीला रंग ही व्यापक रूप से ग्रहण कर लिया गया है। उपवीत को कुमारी कातती है और ब्राह्मण द्वारा उसमें ग्रंथि दी जाती है। 



उपवीत धारण करने वाले व्यक्ति के पूर्वजों के प्रवरों की संख्या के अनुसार ग्रंथियां दी जाती हैं। इसकी लम्बाई एक मनुष्य की चार उंगलियों की चौड़ाई की 96 गुना होती है, जो उसकी ऊंचाई के बराबर है। चार उंगलियां उन चार अवस्थाओं की प्रतिनिधि हैं, जिनका अनुभव मनुष्य की आत्मा समय-समय पर करती है। उपवीत के प्रत्येक सूत्र के तीन धागे भी प्रतीकात्मक हैं।


 वे सत्व, रजस तथा तमस् का प्रतिनिधित्व करते हैं। इस बात का ध्यान रखा जाता था कि सूत्र का दुहरा भाग ऊपर की ओर रहे। तीन सूत्र उसके धारण करने वाले को यह स्मरण कराते हैं कि उसे ऋषि ऋण, पितृ ऋण तथा देव ऋण से उऋण होना है। तीनों सूत्र एक ग्रंथि द्वारा परस्पर बांध दिए जाते हैं, जो ब्रह्मग्रंथि कहलाती है तथा जो ब्रह्मा, विष्णु और शिव का प्रतीक है। इसके अतिरिक्त विविध बातों को सूचित करने के लिए अतिरिक्त ग्रंथियां भीदी जाती हैं।


आचार्य विद्यार्थी को एक दण्ड भी देता था, जिसे वह इस वचन के साथ स्वीकार करता था - 'मेरा दण्ड, जो मुक्त वायुमण्डल में भूमि पर गिर गया, मैं दीर्घायुष्य, वर्चस्व तथा शुचिता के लिए उसे पुनः ग्रहण करता हूं।' दण्ड यात्रा का प्रतीक है तथा उसे स्वीकार करते समय बालक यह प्रार्थना करता था कि वह अपनी जीवन यात्रा सुरक्षित रूप से समाप्त कर सके। 



दण्ड (सोटी) का उद्देश्य भूत-प्रेतों तथा दुष्ट शक्तियों से रक्षा करना भी है। ब्राह्मण का दंड पलाश का होता था, क्षत्रिय का गूलर तथा वैश्य का बेल का होता है। दण्ड की लकड़ी का महत्त्व न होने के कारण समस्त वर्ण सभी प्रकार के दण्ड प्रयोग कर सकते हैं। ब्राह्मण का दण्ड उसके केशों और क्षत्रिय दण्ड ललाट को स्पर्श करता तथा वैश्य का दण्ड उसकी नासिका जितना ऊंचा होता था। अग्नि से जला हुआ नहीं होना चाहिए।


'जब आचार्य द्वारा विद्यार्थी की वास्तविक स्वीकृति का कृत्य आरम्भ होता था। आचार्य ब्रह्मचारी का दाहिना हाथ ग्रहण कर उसका नाम पूछता था। बालक उत्तर देता था— 'श्रीमान मेरा नाम अमुक है।'


आचार्य उससे पुन प्रश्न करता था कि वह किसका विद्यार्थी है। वह उत्तर देता था - 'आपका'। आचार्य उसके उत्तर का संशोधन करते हुए कहता था- 'तू इंद्र का ब्रह्मचारी है, अग्नि तेरा आचार्य है, मैं भी तेरा आचार्य हूं।' इस प्रकार आचार्य अध्यापन तथा रक्षा के लिए विद्यार्थी को अपने संरक्षण में ग्रहण करता था।


इसके पश्चात विद्यार्थी भिक्षा मांगता था। यह सम्पूर्ण विद्यार्थी जीवनपर्यन्त उसके निर्वाह के प्रमुख साधन भिक्षा का विधिवत आरम्भहै। उपनयन के दिन वह माता तथा अन्य सम्बंधियों से भिक्षा मांगता था, जो उसका प्रतिषेध न करें। यह एक संकेतात्मक प्रथा है। उपनयन संस्कार में पीली हल्दी आध्यात्मिकता की, वस्त्र सामाजिक शिष्टाचार के, दण्ड सुरक्षा और अधिकार का प्रतीक है।



यज्ञोपवीत इस बात का प्रतीक है कि ब्रह्मचारी सदैव तीन वेदों से आवृत्त है।मौजी त्रिवृत्समा श्लक्षणा कार्या विप्रस्य मेखला । क्षत्रियस्य तु मौवीं ज्या वैश्यस्य शणतान्तवी॥ आचार्य द्वारा गायत्री मंत्र के उपदेश के साथ छात्र को यज्ञोपवीत धारण कराया जाता है। 


अथर्ववेद में कहा गया है कि उपनयन संस्कार में आचार्य बालक को 'तीन रात्रिपर्यन्त' उदर में रखता है। जब वह दूसरा जन्म ग्रहण करता है तो देवगण उसे देखने के लिए एकत्र होते हैं। उपनयन धारण कर लेने पर बालक द्विज हो जाता है। उपनयन संस्कार में आचार्य द्वारा दिए गए गायत्री मंत्रोपदेश के साथ ही बालक का जो दूसरा जन्म होता है, उसमें आचार्य को पिता और सावित्री को माता कहा गया है


आचार्यस्तु पिता प्रोक्तः सावित्री जननी तथा ।

ब्राह्मणक्षत्रियविशां मौजीबन्धनजन्मनि ॥

जनेऊ पहनने से क्या होता है | janeu pahanne se kya hota hai 

उपनयन संस्कार का उद्देश्य मुख्यत: शैक्षणिक है। अस्तु, इस संस्कार से तात्पर्य बालक को शिक्षा हेतु गुरु के समीप ले जाने से है। इस संस्कार में बालक को जनेऊ उसे नियमों के पालन करने हेतु प्रेरणा देता रहता है। भगवान श्रीराम तो मर्यादा पुरुषोत्तम हैं ही, इसलिए उनका स्मरण करते हुए यह संस्कार सम्पूर्ण होता है। इस अवसर पर निम्न परम्परागत गीत बड़ी श्रद्धा और उल्लास से गाया जाता है- जनेउ आज पैरत दसरथ के लाल दसरथ घर मोद बढ़े। तीन तगा में बिरया बांधे, दसरथ घर मोद बढ़े ॥

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