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Chhath puja history | ये है छठ पूजा की सच्ची कहानी

CHHATH PUJA HISTORY | छठ पूजा की पूरी जानकारी 

आज हम आपको chhath puja की सम्पूर्ण जानकारी देने वाले हैं जैसे - chhath puja kitne tarikh ki hai, chhath arag time क्या हैं साथ ही chhath puja history ,chhath puja kyu kare यदि आपको इन सब बातों को जानना हे तो इस लेख को पूरा पढना होगा

Chhath puja history | ये है छठ पूजा की सच्ची कहानी

छठ पूजा एक साल में दो बार आता हैं 1.चैत्र मास में 2 .कार्तिक मास में ।

 भारत ही एकमात्र ऐसा देश है जहां रोज कोई न कोई  पर्व आते रहते हैं किसी को हम बड़े धूमधाम से मनाते हैं और किसी को गुप्त रूप से  मनाते हैं।

 ऐसे ही महत्वपूर्ण और चमत्कारिक छठ पूजा का पावन पर्व आज हम जानेंगे छठ पूजा को लेकर कुछ महत्वपूर्ण  बातों को

हमारा देश एक ऐसा देश है जिसको त्योहारों का देश कहा जाता है यह पर्व भारत के बिहार, पूर्वी उत्तर प्रदेश और झारखंड में विशेष रूप से मनाया जाता है

 लेकिन इसकी लोकप्रियता को देखते हुए छठ पूजा संपूर्ण विश्व में बड़े ही धूमधाम से मनाया जाने लगा। छठ पूजा का हमारे हिंदू धर्म में एक अलग और विशेष महत्व है

What is the history of Chhath Puja | छठ पूजा का इतिहास क्या हैं 


आखिर यह छठ पूजा कैसे शुरू हुई छठ पूजा को लेकर हमारे पुराणों में अनेक प्रकार की  कथाएं मौजूद हैं हम यहाँ पर सिर्फ दो ही कथा को कहेंगे

छठ पूजा को लेकर राजा प्रियवंत की कथा 
राजा प्रियवंत एक बहुत ही सच्चे और सरल राजा थे उनके पास सभी प्रकार के सुख होते हुए भी वह अंदर से बहुत दुखी थे क्योंकि उनके पास कोई भी संतान न था

संतान सुख की इच्छा से राजा प्रियवंत महर्षि कश्यप के पास पहुंच गए और अपनी दुख भरी बातें बताई फिर महर्षि कश्यप ने संतान प्राप्ति हेतु यज्ञ किया

यज्ञ पूरा होने के बाद महर्षि कश्यप ने प्रियवंत की पत्नी को खीर का प्रसाद खाने के लिए दिया कुछ समय पश्चात प्रियवन्त की पत्नी मालानी गर्भवती हो गई

 प्रियवंत की पत्नी ने एक मरे हुए संतान को जन्म दिया प्रियवंत अपने मरे हुए पुत्र को लेकर श्मशान गए अपने पुत्र का अन्तेस्टी कर्म किया

उसके बाद  पुत्र के वियोग में खुद भी मरने को तैयार हो गए ठीक उसी समय भगवान की मानस पुत्री देवसेना वहां पर उपस्थित हो गई

राजा की दैनंदिनी स्थिति को देखकर भगवान की मानस पुत्री देवसेना ने राजा प्रिय वंत को छठी मैया का व्रत पूजा करने को कहा

उसके पश्चाद प्रियवंत ने ठीक वैसे ही छठ पूजा का व्रत किया और उनके सभी मनोकामनाएं पूरी हो गई उनको पुनः संतान की प्राप्ति हुई

ऐसी मान्यता है कि यह पूजा प्रियवंत ने कार्तिक शुक्ल षष्ठी के दिन किया था तभी से इसी दिन को छठ पूजा के नाम से जाना जाने लगा।

छठ पूजा को लेकर भगवान राम और सीता की कथा 

छठ पूजा की एक और कथा है जो भगवान राम और सीता से संबंधित है जब भगवान राम सीता लक्ष्मण 14 वर्ष के वनवास से पुनः अयोध्या वापस आए

रावण के मृत्यु के पाप को मिटाने के लिए भगवान राम को ऋषि-मुनियों ने राजस्व यज्ञ करने को कहा । भगवान राम ने पूजा करने के लिए मुद्गल ऋषि को बुलाया

 फिर मुद्गल ऋषि अयोध्या आकर पहले मां सीता को गंगाजल से पवित्र किया और छठी मैया का व्रत पूजा करने के लिए कहा ।

साथ ही कार्तिक शुक्ल षष्ठी तिथि को भगवान सूर्य देव की उपासना करने का आदेश दिया

फिर माता सीता ने मुद्गल ऋषि के ही आश्रम में रहकर 6 दिन तक भगवान सूर्य की उपासना व पूजा की जो भविष्य में  छठ पूजा के नाम से विख्यात हुआ।

इन सब कहानीयों को पढने के बाद हमें एक बात समझ में नहीं आई !आखिर कौन है छठी मईया ?
छठी मईया भगवन सूर्य की बहन हैं यह पर्व सूर्य और उनकी बहन को समर्पित हैं

क्योंकी धरती पर जीवन सूर्य और उनकी बहन के बिना संभव ही नहीं हैं छठ पूजा का व्रत करके मानो हम भगवान् सूर्य को धन्यबाद करते हैं यह एक विश्वास और आस्था का विषय हैं।

chhath puja 2019

Chhath puja kaise manaye | छठ पूजा कैसे मनाया जाता है


छठ पूजा कुल 4 दिन की होती है कहीं-कहीं इसको 3 से 5 दिन भी मनाया जाता है

छठ पूजा की शुरुआत कार्तिक शुक्ल चतुर्थी से लेकर कार्तिक शुक्ल अष्टमी तक समापन हो जाता है

इन्हीं 4 दिनों में छठी मैया की विशेष पूजा आराधना होती है छठ पूजा का व्रत कुल 36 घंटे का होता है।

छठ पूजा का पहला दिन नहाए खाए

नहाए खाए छठ पूजा की पहली शुरुआत इसी नाम से होती है नहाए खाए मतलब  नहाओ खाओ घर शुद्ध रखो स्वच्छ बनो मन पवित्र रखो फिर पूजा करो

छठ पूजा का दूसरा दिन खरना लोहंडा

खरना कार्तिक शुक्ल पंचमी के दिन को खरना लोहंडा नाम से जाना जाता है क्योंकि व्रती दिनभर

 भूखा प्यासा  रहकर बिना अन्न पानी खाए फिर रात को भोजन प्रसाद ले लेता है जिसको खरना लोहंडा कहा जाता है।

 खरना का प्रसाद लेने के लिए अड़ोस पड़ोस मोहल्ले वालों को भी बुलाया जाता है या घर घर खरना का प्रसाद पहुंचा दिया जाता है।

इस दिन गन्ने के रस में चावल का खीर बना लिया जाता है साथ ही दूध से बनी वस्तु मावा, चावल का पीठा,

कसार आदि प्रसाद स्वरूप दे दिया  जाता है इस दौरान नमक और चीनी का उपयोग करना शास्त्र विरुद्ध है

तीसरे दिन संध्या अर्घ्य ( डूबते हुये सूरज को अर्घ देना)

जिस प्रकार अनेको साल पहले यह पर्व मनाया जाता था ठीक वैसे ही आज भी इस पर्व को मनाया जाता है

 तीसरे दिन व्रती किसी नदी में या कोई तलाव सरोवर में जाकर घुटने भर पानी में खड़े होकर भगवन सूर्य की पूरी विधिवत पूजा करता हैं

 पाच बार परिक्रमा किया जाता हैं अंत में डूबता हुवा सूरज को अर्घ दिया जाता हैं।

छठ पूजा का चौथा दिन समापन का दिन होता हैं इस दिन छठी व्रती भगवन सूर्य को उगते हुये अर्घ देते हैं

 सूर्य की विधिवत पूजा होती हैं फिर अंत में सभी भक्तो को छठ पूजा का प्रसाद देदिया जाता हैं और व्रत का समापन करते हैं।

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